प्रेम कविता

तुम्हारे जाने के बाद
मैंने जाना कि प्रेम सबसे बड़ा है

तुम्हारा आना इसलिए था
कि प्रेम था
तुम्हारा जाना इसलिए था
कि प्रेम नहीं था

तुम्हारे आने
और तुम्हारे जाने से
बहुत बड़ा है प्रेम

मेरे होने
और मेरे ना होने से
बहुत बड़ा है प्रेम

इतना समझना बहुत है
कि भूगोल की
सभी बड़ी बातों के जड़ से
जो बनता है-
बिग बैंग के होने
के बाद की घटनायें सारी,
पृथ्वी के बनने के
बाद जो कुछ भी हुआ
इंसानों के जन्म के बाद
जो लाखों वर्षों में हुआ
जितनी भी भाषायें बानी
जितनी भी सभ्यताएं आयीं
जितने भी साम्राज्य बने
उन सब के बाद हमने जो पाया
वो प्रेम है

ये कितनी बड़ी बात है
कि इतने सालों के बाद
इतिहास के बाद
भूगोल के बाद
जो मुझ तक पहुँचा
जो तुम तक पहुँचा
वो प्रेम था

इसे अकेले नहीं समझ सकता
आओ,
इसे साथ समझते हैं

18.9.17

कविता बुलाती है मुझे

कविता बुलाती है मुझे

वो गूंगी
किसी पन्ने के पीछे बैठ
इशारों में करती है बातें
मैं
सुनता हूँ उसे

जीवन अपनी गति से
बढ़ती है
मैं जीवन से भी तेज़ चलता हूँ
-कविता छूट जाती है पीछे

आवाज़ देकर
कविता बुलाती है मुझे

मैं अब नहीं समझ पाता
उसकी बातें
(मैं उपन्यास को समझता हूँ)
वो कमसमझ भी है

लेकिन जब कभी रुक कर
उस गूंगी को सुनता हूँ
तो
ठीक लगता है

तो
लगता है कि
जीवन जीना आसान सिर्फ इसलिए है
कि उसमें कविता रहती है

10.9.17

दर्द

बेदर्द हूँ, दर्द लाया जा रहा है
भूली याद को बुलाया जा रहा है 

मैं अब वो नहीं जो था कभी
मुझे वहशी बनाया जा रहा है

तुम्हें जाना था तो आये क्यों थे
ये रिश्ता सिर्फ निभाया जा रहा है

मैं जो था जैसा भी था वो मैं था
मुझे कुछ और बनाया जा रहा है 

- 12.8.17

मेरी सारी कवितायें झूठी हैं

मैं सालों से झूठ
लिख रहा हूँ
और तुम उसे पढ़ रहे हो

मेरे झूठ को मेरा सच मान कर
तुम मुझे महान समझ रहे हो
-मैं इस बात से खुश होता हूँ

मेरी झूठी कविताओं में
तुमने ख़ुद को खोज भी लिया है
-आह! कितनी अद्भुत बात है ये

मेरे सारे झूठ के पीछे
मैं लाल रंग के हाफ पैंट
में बैठा हँसता हूँ

(मैं तुम्हें बेवकूफ बनाते हुए नहीं थकता
तुम बेवकूफ बनते नहीं थकते)

कवि से प्रेम मत करना
वो सिर्फ तुम्हारी
बेवकूफियों पर
कवितायें लिख रहा है

लेकिन रुको-
मैं भी तुम्हारी कविता पढ़ता हूँ
मैं भी तुमसे प्रेम करता हूँ
मैं भी तुम्हें महान मानता हूँ

हम दोनों कितना झूठ जी रहे हैं
ये दुनिया कितनी झूठी है

17.8.17

खेल

ये सारा खेल जो रचा है मैंने
वो सब है साथ निभाने का
दो पल साथ चलने का

मैं पास तुम्हारे आता हूँ
जब भी
मैं पास खुद के भी
आता हूँ
-तुम में मैं रहता हूँ

जिस दिन ये पता बदल जाएगा
ये सारा खेल खत्म हो जाएगा

तब तक
आओ ना
ये खेल खेलते हैं

11.8.16

सरहद पार से

मैंने सरहद पार की कहानियां सुनी हैँ
सुना है कितना कुछ
सुनना है कितना कुछ

कितना कुछ बाकी रह गया
कितना कुछ सुनाओगे

सरहद पार से लोरियाँ
सुनने का मन है
सुन कर लोरी
सो जाने का मन है

मुझे बताओ कि तुमने भी
खेला क्या छुप्पन छुपाई
लट्टू फिराया क्या
दोपहर के वक़्त
भाग कर क्रिकेट खेलते थे?
मैं ये सब करता था...
मुझसे हूँ हो ना तुम भी?

अब देखने का मन है-
मुझे बुला लो दोस्त
लूडो खेलेंगे
क्रिकेट खेलेंगे
नज़्में सुनेंगे

तुम भी आना
मिलना मुझसे
सत्तू के पराठे खिलाऊंगा।

16.8.17
(ये कविता BBC Hindi के लाइव प्रोग्राम में लिखी गयी थी जहाँ हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के युवा कवि और शायर एक दूसरे से Facebook Live पर Skype के ज़रिए बात कर रहे थे। अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए मैंने ये कविता पाकिस्तान के दोस्तों के लिए लिखी।)

बरसात के इस तरफ से

मैं बरसात के
इस तरफ बैठा
उस तरफ के
बरसात को देखता हूँ

देखता हूँ
पानी, पत्ते, बादल,
तालाब, झील,
नदी, समुद्र
अपनी खिड़की से

खिड़की से
देखता हूँ कितना कुछ-
बरसात से धुल कर
दिखती हैं तस्वीरें साफ

मैं अपलक
देखता हूँ सबकुछ
निरंतर, लगातार

खिड़की से
यादें आती हैं
जाते हैं
संदेश कई
-शून्य में

शून्य में
शांति है
जो देवदार के
पेड़ों में भी है

कुछ देर के लिए
देवदार का पेड़ बनना
कितना सुखद है-
बिल्कुल खिड़की
से उस तरफ के
रुक चुके बरसात को
देखने जैसा।

-24.7.17

मैं यहीं हूँ, कब से

मैं
यहीं हूँ
कब से...

एकदम यहीं
बैठा हुआ सा,
तुम्हारे साथ ही
तुम्हारे जाने के बाद भी

ठीक मेरे बगल
कुछ गर्माहट बैठी है
देखो ना,
हम कब के साथी
अब भी यहीं हैं

तुम्हारा जाना
कितना अकस्मात था
उतना ही जितना
तुम्हारा मेरे जीवन में आना

मैं चालाक था
सारे खास पल
दर्ज किये कविता में

इसलिए कि
तुम्हारे जाने के बाद भी
तुमको पढ़ सकूँ
बार बार

लेकिन देखो ना
अब भी बैठा कविता ही
लिख रहा हूँ

तुम भी पास बैठी हो ना,
इसलिए।

-8.7.17

ग़ज़ल

ये कौन लोग हैं जो मुझे जानते हैं
मैं 'मैं' नहीं हूँ, ये क्यों नहीं मानते हैं

शहर की वीरानियों में चलना ठीक है
एक आप हैं जो भीड़ को ही छानते हैं

ख्वाब सारे खो गए, देखो कब के
अब हम रात को बस रात मानते हैं

बारिश होती है तो कुछ याद तो आता है
चलो छोड़ो, अब तुम्हें हम नहीं जानते हैं

ग़ज़ल

हैं कहानियाँ बहुत हमारे पास, ये तेरा मेरा अफसाना है
हमें छोड़ दो इन गलियों में, के तुम्हें घर भी जाना है

मैं मुझसा नहीं कोई और हूँ, लोग पागल भी कहते हैं
सब कुछ गवां के जो खोजूँ जाने वो कौन सा खजाना है

ख्वाब यूँ के सब खो गए, सपने सारे कब के सो गए
तुम आ जाओ बस- एक नींद बची है, साथ सो जाना है

मैं वहाँ पहुँच भी चुका जिस सफ़र पे साथ निकले थे
अरे, तुम ही खो गए, बस उम्र भर खुद को समझाना है

6.6.17