अकेलापन

जब कभी फोन बजता है
तो,
दो पल के लिए
ख्याल आता है
किसी ने याद किया....

पर जब फ़ोन आता है किसी
ऑफर के लिए,
कॉलर ट्यून के लिए,
कॉल सेंटर से किसी अजनबी की आवाज़ सुनता हूँ
तो लगता है
उस तरफ भी कोई
बैठा है
इंतज़ार में किसी के...

वो भी मेरी तरह
अकेला ही होगा शायद

उससे ही बात करके अकेलेपन से लड़ लेता हूँ कभी कभी !

एक किरदार

यूँ तो ऐसा भी किया हमने,
कुछ लम्हात हँस कर देख लिया
मुस्कान बिखेर ली कुछ देर...

फिर एहसास हुआ
मेरी साँसों पर
पहरा लगा रखा है किसी ने...
मेरी ख्वाहिशों को
ग़ुलाम बना रखा है किसी ने…

फिर चुप ही रहा मैं !

ग़ज़ल 1

तेरी परछाई अब मेरी साँसों को हैं बेक़रार करते 
ग़र जिंदा होते तो सिर्फ तुमसे ही प्यार करते 

दरवाजों को कहो आँखों का इंतज़ाम कर लें 
मुझे तो इक अरसा हुआ तेरा इंतज़ार करते 

ख़ाक में मिला कर मेरी हस्ती को गए थे तुम 
सोचा था तेरे साथ ही ज़िन्दगी ख़ाकसार करते 

नहीं ऐसा भी कि मैं अंजान हूँ अजनबी हो तुम
बातें ऐसे करते हो जैसे हम पहली बार करते 

उस लम्हे में कुछ महसूस तो हमने किया ज़रूर था
उस लम्हे का इस्तेमाल करते हो मुझे शर्मसार करते

आज देखा उस खँडहर को जहाँ कभी मिले थे हम,
तुम तो ख़ामोश हो ,बेहतर होता उस से ही बात करते

कुछ ख्याल 1

कभी कभार सोचता हूँ 
वक़्त को जकड़ लूँ
मुट्ठी में ...

कमबख्त, निकल जाती है 
हाथों से 
हवा के माफ़िक!

*

हर ज़ख्म तुमने ही दिया 
हर दर्द का रिश्ता है तुमसे 

तुम यूँ तो हमदर्द नज़र आते हो!

*

बस एक ग़ुबार सा उठा है अभी
रात के अँधेरे में दिखता भी नहीं

दिख तो जायेगा ज़रूर कविता में !

*

बहुत दिन हुए
लबों पर मुस्कुराहट आयी नहीं 
कुछ ऐसा करते हैं ...

हँसते हैं!

*

क्यों ना ऐसा करूँ मैं ,
तुम्हें याद कर लूँ ...

दो पल के लिए साथ तो होंगे हम

*

अब सोचता हूँ 
दीवारों को दोस्त बना लूँ ...

कभी तो रिहा करेंगे मुझे !

*

मोहम्मद

आज दिल कुछ ऐसा किया कि
फारसी की वो किताब पढ़ लूँ
समझ लूँ कहना क्या चाहते थे तुम
बात कर लूँ पन्नों से
उनकी ही ज़ुबान में

फिर , अपनी भी कमियाँ याद आ गयी!

किलकारी

तुम्हारी गोद में सो तो नहीं पाता,
पर तुम्हारी हाथ का बुना
स्वेटर पहन लेता हूँ ...

...पहन लेता हूँ
तुम्हारी परछाई फिर से ,
तुम्हारे साये में फिर से
पलने लगता हूँ ...

...सुनाई तो देती होगी तुम्हे
मीलों दूर से आवाज़

...मेरी किलकारी की !