मेरी अंतिम कविता

मुझसे मुलाक़ात तुम्हारी फिर ना होगी,
मैं तुझसे मिल ना सकूँगा, ऐ कविता|

मुझे अब भी याद है
जब पहली दफा
मिला था मैं तुझसे-
बारह साल पहले...
तब से अब तक
मैं अपनी दुनिया में
खास था
-अब मैं मामूली होना चाहता हूँ

सब खूबसूरत था-
सब झूठ था

मुझे सच की ज़रूरत नहीं है
मेरा झूठ बहुत सच्चा है
लेकिन अब इस झूठ का बोझ
बढ़ चला है

हर पल को कविता के
कैमरे में क़ैद करना,
नहीं चाहते हुए भी
शब्दों को आकार देना-
स्वीकार करना अपने आपको,
वो करना जो परे है
मेरे इंसानी हाथों और एहसास से-
अब नहीं होता|

दो महीने पहले उसने कहा
तू एक एस्केप है-
तब से अब तक मैं
इस जद्दोजहद में था
-वो भी तो कविता लिखता था...
उसने तेरा साथ क्यूँ छोड़ा?

और जॉन?
वो जो किरदार था उस नॉवेल में,
जो खुद को कवि समझता था
और लिखना भी चाहता था,
लेकिन उसे भी लगा कि वो कवि नहीं है-
मुझे भी लगता है मैं कवि नहीं हूँ,
ऐ मेरी अंतिम कविता|

अब मुझे लगता है
कोई कवि नहीं है
सब सिर्फ झूठे हैं-
ये अंतिम कविता भी
एक झूठ है-
सत्य कविता में नहीं है,
कहानी में नहीं है-
वो परे है इन सबसे
वो परे है हम सबसे

कविता में
शब्दों के बीच
जो जगह खाली है
वो मौन सत्य है
जो हमेशा हमारे साथ है,
ऐ मेरी अंतिम कविता|
27.10.12

एक ख़्वाब ज़िन्दगी

मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ
मेरा हकीक़त से वास्ता है क्या?
तुम मुझे ख्वाब में मिला करो,
मुझे पूर्णता: से करना है क्या?

तुम खोजते फिरते हो मतलब-ए-ज़िन्दगी
ज़िन्दगी मतलब से कोसों दूर है
चाहते हो शौहरत हर मोड़ पर
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मौत मशहूर है

मैं ख्वाब में जीता हूँ, ख्वाब में मरता हूँ
जो चाहता हूँ, हर वो चीज़ करता हूँ
जो पाने की हसरत तुम रखते हो
उसे मैं पाता हूँ, जब जी चाहे खो जाता हूँ

वो जो शोले दिखते थे दूर से, उसका नाम सूरज रख दिया
जब जी चाहे बुझाता हूँ, जब जी चाहे जलाता हूँ
वो जिसे तुम ढूँढ़ते हो, खोजते हो हर घड़ी
मैं अपनी सल्तनत में ख़ुदा कहलाता हूँ

जब हकीक़त सिर्फ भ्रम है
तो मैं क्यों भ्रम में जिया करूँ?
आँख मूंदे ज़िन्दगी बैठी है
और मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ!

ज़िन्दगी की उम्मीद

वो पेड़
ठीक से उगा भी नहीं
और मुरझा गया-
उसके पत्ते
अब भी
बारिश का इंतज़ार करते हैं

दो तीन सदियों पुराना
एक गुम्बद
उसके ठीक सामने खड़ा है,
कुछ बेजुबान बेंच
उसे घेर कर बैठे हैं,
बुझे हुए कुछ लैम्पपोस्ट
गड़े हैं ज़मीन में
उसके पास ही-
ये डराते हैं
ज़िन्दगी की हर उम्मीद को
वो पेड़
अपने साथ
जिंदगी की उम्मीद लेकर आया था
लेकिन
मौसम की बदमिज़ाजी ने
उसे मुरझा दिया

खामोश
वो अब भी बरसात का इंतज़ार करता है

उसके इर्द-गिर्द
दो-एक कवितायें घूमती हैं अक्सर
एक पन्ने पर उतरने की
कोशिश करती हैं

लेकिन
वो बेंच वो लैम्पपोस्ट वो गुम्बद-
सब के सब
उन्हें घेर कर
आत्महत्या करने पर मजबूर कर देते हैं

पर
वहाँ
हर रात
एक नयी कविता का जन्म होता है-
जिंदगी की उम्मीद के साथ

बड़ी मुश्किल से
एक कविता
बच कर
इस कागज पर उतरी है
इसे ज़िन्दगी से मोहब्बत है-
इसे ज़िन्दा रहने दो!

30.6.2012

बारिश का एक घर बनाएँ

चलो,
बारिश का एक घर बनाएँ
बूंदों से घर सजाएँ

बारिश का एक घर बनाएँ

ख़्वाब सारे एक साथ
झरोखे पर रख देंगे
जब जी करेगा
चुनेंगे, देखेंगे- हँस लेंगे

आँगन में होगी
शैतानी खूब सारी-
हम सूरज की किरणों से नहाएंगे
खेलेंगे कितकित और
लट्टू घुमाएंगे
होगी लुका-छुप्पी उनके साथ
जो हमें दोस्त कह कर खोज ले जायेंगे

ये सब होगा जब हम मिलेंगे
ख़्वाब देखेंगे
सपनों को महसूस करेंगे
आज़ाद कर देंगे सालों से क़ैद
अपने बचपन को
बिखेरेंगे बेमतलबी मुस्कान

चलो ना,
बारिश का एक घर बनाएँ
बूंदों से घर सजाएँ

कवितायें लिखना छोड़ दो

अब तुम कवितायें लिखना
छोड़ दो!
अब तुम कहानियाँ पढ़ना
छोड़ दो!
तुम्हारी संवेदनाएँ मर चुकी हैं

तुम बस कवितायें मैन्युफैक्चर कर सकते हो,
उनमे मर्म नहीं ला सकते!

किसी की भावनाओं को
समझ नहीं सकते तुम

मतलबी हो गए हो...

इंसानियत मर चुकी
है तुम्हारी!

ग़ज़ल 7

जो तुम मिल सकते हो बचपने के साथ तो कहो
हमें दिक्कत है बड़प्पन से, बात समझो तो कहो

तुम देखो शक की निगाहों से औ’ देखूँ मैं तुम्हें
ये रिवाज़ कैसे निभाऊं मैं, कुछ और हो तो कहो

मैं तलबगार दोस्ती का तुम रिश्ते निभाते पैसों से
साथ रहना हो तो तुम बदलो, जो ना हो तो कहो

कैसे कह दूँ कि मैं खुश हूँ अजनबी से माहौल में
मुझे जंगलों-पहाड़ों में रहना, चलना हो तो कहो

तुम देखते नहीं जो विपदा वो देखता हूँ मैं हमेशा
“रिश्ते ज़ब्त-सपने ज़ब्त”; तुम्हें देखना हो तो कहो

~~~
“अब लगता नहीं कि अपना बसेरा है इस गली
चलो ना,चलते हैं वहाँ जहाँ मोहब्बत हर डली”
~~~

आस्था

मैं देखता हूँ
उदासी से घिरे
उस घर को
जिसका सहारा सिर्फ
सुबह-दोपहर-शाम
का भजन है

उस परिवार के मुखिया
को असीम आस्था है
एक आपार शक्ति पर
जो एक दिन सारी
समस्याओं का अंत कर देगा-

वो ख़त्म कर देगा
कर्जदारों का क़र्ज़

देगा मुआवज़ा
कई सालों तक उस बाप के
अपने बच्चों के लिए
आधा पेट सोने का

वो दे देगा माँ को
एक नया गहना
जो वो अपने बेटे के पढ़ाई के कारण
नहीं पहन पाई

वो शायद अचानक से दे देगा
दहेज बेटी के लिए
जो पढ़ी-लिखी तो है
लेकिन इंतज़ार में है
उस असीम शक्ति के कृपा की

वो शायद बना देगा
उस नास्तिक बेटे को आस्तिक
बहुत खुशियाँ देकर
शायद कई हज़ार साल बाद
इस समाज का ढाँचा बदल कर

शायद कई युगों बाद
सिक्कों के वजन के तले
दब कर ख़त्म होती
कई आस्थाओं को फिर से जिंदा करेगा

शायद-शायद-शायद

फिर भी
उनकी सासें टिकी हैं
उस आस्था के ऊपर
जिनके सहारे वो जिंदा हैं

वो जो खूबसूरत है एक फूल की तरह!

वो जो शामिल है मेरे हर पल में 
जिसके साथ रहा हूँ चल मैं 
जिसके कारण ज़िन्दगी हुई रौशन 
एक नूर की तरह 

वो जो खूबसूरत है एक फूल की तरह!


जिसकी मुस्कान हर ग़म भुला दे
जिसका समर्पण प्रेम करा दे 
वो जिसके प्यार के सामने हूँ 
सिर्फ एक धूल की तरह 

वो जो खूबसूरत है एक फूल की तरह!


तुम समझती हो मुझे, तुम अपनाती हो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ- इस हद तक जानती हो मुझे 
मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा हो तुम 
कभी भूल नहीं सकता भूल की तरह

तुम खूबसूरत हो सबसे खूबसूरत फूल की तरह!

समीप आना चाहता हूँ

वो दूर मुझसे जा रही, मैं समीप आना चाहता हूँ

जग विशाल समृद्ध सा है, 
तुम विभा इस जग की 
मैं शुन्य जगत के आकारों में, 
तुच्छ- घिरा हुआ विकारों में 

तुम आकार, मैं निराकार 
बस तुम्हे पाना चाहता हूँ 
मैं समीप आना चाहता हूँ!

मैं नहीं कोई और, तुम्हारी छाया हूँ 
स्वयं कुछ भी नहीं, तुमसे ही बन पाया हूँ 
तुम वर्षा, मैं प्यासा!
बस तुम्हे अपनाना चाहता हूँ
मैं समीप आना चाहता हूँ!

सामिप्य तुम्हारा चाहिए, सानिध्य तुम्हारा चाहिए 
पराया मत समझो, अपनापन तुम्हारा चाहिए, हक तुम्हारा चाहिए!

तुम आत्मा, मैं शरीर!
बस तुम्हारा स्पर्श चाहता हूँ 
एक होना चाहता हूँ 
समीप आना चाहता हूँ!

रात

शहर के तंग गलियारों में
रात के अँधेरे में
फूटपाथ पर-
उम्मीदों को जलते देखा है?
लाशों को चलते देखा है?
देखा है ठंड से सिकुड़ते रूह को?
देखा है लड़ते-झगड़ते जिस्म को?

सुनाई देती है गूँज ख़ामोशी की
मरने की बेबसी चीखती है
चिल्लाती है दिल की धड़कने
सुन्न कर देती है रूह को-
जब भेदती हैं सर्द हवाएँ
माँस के गर्म लोथरों को,
ज़िन्दगी प्यासी ही रह जाती है-
घाव से रिसते मवाद को
किसी की प्यास बुझाते देखा है?

लाशों के अंबार लगे होते हैं-
लाशें पड़ी रहती हैं
मक्खियाँ भिनभिनाती हैं
लाशों के ऊपर
ज़मीन लाल हो जाती है खून से,
और फिर लाशें पीती हैं खून
प्यास बुझाने के लिए

कभी सुना है-
सन्नाटे को काटती
सिसकती
रोती
चीखती
चिल्लाती
बेबस
आसुओं में सनी
जिस्म की पुकार?

तुम्हें सुनाई नहीं देगा
तुम्हें दिखाई नहीं देगा
तुम भी एक लाश हो!

बारिश में एक खुशबू है

बारिश में एक खुशबू है...

सौंधी सी
हलकी सी
जिसमे कोई मिलावट नहीं

वो खुशबू
जो बचपन
में भी सौंधी सी थी,
हलकी सी
बिना किसी मिलावट के

वो खुशबू
मुझे बचपन में लिखी
एक कविता की याद दिलाती है

"छल-छल करता, कल-कल करता
बरस रहा है बूँदा मोटा,
बूँद-बूँद को तरसे जीवन
जीवन का ये पहलू खोटा"

वो खुशबू
मुझे मेरे
बचपन की याद दिलाती है

वो खुशबू
मुझे उस नाव की
याद दिलाती है
जो मैं होमवर्क की कॉपी से
कागज़ फाड़ कर बनाता था-
जिसे मैं मोहल्ले के
छोटी सी नाली में
दौड़ाता था
जिसे दूर जाता देखता था
देर तलक

वो खुशबू
मुझे एहसास दिलाती है
कि मेरी
होमवर्क कॉपी की नाव
अब बड़ी हो गयी है
अब जहाज़ बन गयी है-
अब वो एक समुन्दर में
गोते लगाती है

वो खुशबू
मुझे मेरे घर की याद दिलाती है
वो खुशबू
मुझे मेरे आँगन की याद दिलाती है

देखो ना,
आज कितनी तेज़ बारिश हुई दिल्ली में!

सियासत

जो कुछ
भी था
उसे
सेनापती ने
रख लिया,

सिपाहियों
को तो
मिली
ज़िल्लत की मौत
बस!

ग़ज़ल 6

आज ज़िंदगी बहुत परेशान सी है 
ज़िंदा रहने के खबर से हैरान सी है 

इजाज़त मिली सरकार से जीने की 
ये हुक्म भी मौत के फ़रमान सी है

बढ़ रहा है लिए अंगारे अपने झोले में 
इसकी किस्मत भी हिन्दोस्तान सी है 

डर कहाँ किसी को हैवानियत का 
अब तो डर बस तेरे भगवान की है 

मेरा शहर बहुत साफ़ है आजकल 
पर कुछ लाशों की यहाँ निशान सी है 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जिसे दुश्मन समझते रहे देर तक 
उसकी शक्ल भी तो इंसान सी है

अलविदा

"कुछ पल पन्नों में बस नहीं सकते,
दिल में बसा के रखना होता है उन्हें"

यूँ तो सफर लम्बा सा था
एक सफह पलट कर देखता हूँ अब
तो कुछ पत्ते नज़र आते हैं-
मुड़े से, ज़मीन पर गिरे से,
साथ ही हमने रौंदा था उन्हें
चले थे कारवाँ लेकर जब

चुन लो वो पत्ते
हमारी यादों के गवाह हैं वो

हो सके तो
रख लेना अपने पास
हर वो लम्हा
जो साथ बिताया था हमने
हर पल में कुछ
ओस की बूँदें शामिल कर दी हैं मैने-
कुछ मिलावट आँसुओं की भी होगी शायद

देख लेना एक बार
अपनी उँगलियों से सहला कर!

वक्त गुज़रेगा
(गुज़रता ही है)
फिर से कहानी कोई नयी आएगी
मंच सजेगा
तुम होगे वहाँ फिर से
मेरी कमी को महसूस करना
हो सके तो...

तब बुदबुदा देना
हवा के कानों में मेरा नाम-
जब गुजरेंगे मेरे पास से
तो सुन लूँगा मैं

कुछ सामान यूँ छोड़े जाता हूँ
तुम्हारे पास

रिश्ते बुनते तो नहीं हम,
बेबाक से रिश्ते
बन जाते हैं खुद-ब्-खुद

कैसे कह दूँ
कोई रिश्ता नहीं तुमसे?
खुद से पूछ लो-

कुछ तो है
हमारे दर्मयाँ शायद
कुछ तो बन गया था
हमारे दर्मयाँ शायद...

ज़हरीले चुटकुले

वो जो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

जब शहर नाख़ून सा होता है
वो जो सपने देखता है,ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

उधार की ज़िंदगी में, माँस के लोथरे में
जब हड्डियाँ टकराती हैं, जब तूफ़ान बदन में उठता है
जब प्यास गला सुखाती है, जब अपना खून पीना पड़ता है 

तब जब वो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

कुकुरमुत्तों के झुण्ड में, इंसान का बच्चा पलता है
खूँखार हँसी वो हँसता है
जब बदन बेशरम हो जाता है
सन्नाटे में अधनंगे जिस्म की हेराफेरी होती है
गाली जब नाम बन जाते हैं
जब पैदा होना एक पाप बन जाता है 

तब जब वो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

जब साँस कभी वो लेता है, जब पैदल दो कदम भी चलता है
शहर आवारा सा
शहर सुनामी सा
शहर बदतमीज़ सा
जब उसे घसीटता है
ज़मीन पर लेटा कर जब उसे कुचलता है

तब जब वो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है!

ग़ज़ल 5

जो कुछ भी है सीखा यहाँ वो भुलाना चाहता हूँ
अगर मैं हकीक़त हूँ, तो ख़्वाब होना चाहता हूँ

मेरे अन्दर का मुसलमान हावी मेरे हिन्दू पर
मेरा हिन्दू लड़ता है,ये फ़साद रोकना चाहता हूँ

चिंगारियाँ जला दें इंसानियत को-नहीं माँगता
जो बुझा दें उन्हें मैं तो वो आब होना चाहता हूँ

नफ़रत उससे जो करे मेरे नाम का इस्तेमाल
मैं कौन हूँ? क्यूँ हूँ? मैं तो हवा होना चाहता हूँ

जद्दोजहद-परेशानियाँ-दर्द- कई गुना बढ़ चले
ख़तम करो सब! मैं अब दवा होना चाहता हूँ

हिसाब-किताब

एक काम करो,
जो तुम इंसान को
चुन चुन कर
इंसान कहते हो-
कह लो

एक काम करो.
जो तुम
किसी को
भगवान् मानते हो-
मान लो

जो बचे-खुचे चीथरे हैं मांस के,
हम उन्हें मिलकर जानवर कहेंगे

जो इंसान कभी
कुचलेगा जानवरों को,
हम सभी एक साथ
कुचलेंगे

जो भगवान् कहेगा
टुकड़े देने को उसे,
हम उसे टुकड़े दे देंगे

इंसानियत बची रहेगी
दुनिया चलती रहेगी!

ग़ज़ल 4

ख़्वाबों के दरीचों पर नाम लिखा है
हमने खुद अपना अंजाम लिखा है

ना कर रस्साकशी,छेड़ ना लाशों को
जिंदा हैं वहाँ जहाँ शमशान लिखा है

आवाज़ निकल पड़ी उस सूरत से
जिसको तुमने बेजुबान लिखा है

सब कहते हैं वो मर गया है, या रब!
उसने तो कातिल का नाम लिखा है

जिसको कह रही है पूरी कौम पागल
उसके नाम के आगे विद्वान लिखा है

चिट्ठी डाली है खुदा को, माँगा है हक
अपने ही मौत का फरमान लिखा है

ग़ज़ल 3

कौन सा दिन है, ये क्या साल है
मुझे क्या पता मेरा क्या हाल है

तुम मेरे हो यही समझता था मैं
मैं कौन हूँ, ये अब तेरा सवाल है

तह तक जाऊं तो मैं कैसे जाऊं
रुकावट है, ज़हन में जंजाल है

दौलत तो कुछ नहीं है पास मेरे
एक ग़ज़ल है, हालत फटेहाल है

भीगा हुआ हूँ बौछार-ऐ-ग़म से
मुद्दा ये कि मेरा नाम निहाल है

*****************************
जब हौले से छूती है तो कहती है हवा मुझसे
तू है तो खुदा कौन है? अब ज़रूरी ये बवाल है!

ग़ालिब मिला था

...और,
आज फिर
ग़ालिब मिला!

हमेशा की तरह
ज़िंदगी से मोहब्बत
करता हुआ-
उलझनों से
घिरा हुआ,
उलझनों से
लड़ता भी,
उलझनों का
मजाक भी उड़ाता,
आज फिर
ग़ालिब मिला!

दायें हाथ में
प्याला लिए
एक नज़्म सुना रहा था मुझे,
हमेशा की तरह

मेरी आँखों में
देख कर
फिर बोल पड़ा,
"हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी
कि हर ख्वाहिश पे दम निकले"

सालों पुराना ये सिलसिला
दुहरा गया

सालों से मैं चुप रहा

आज बोल पड़ा,
"उस एक ख्वाब का क्या,
जिसकी खातिर उम्र भर
की नींद गिरवी रख आया हूँ?"

ग़ालिब मुस्कुरा रहा था...

एक कविता खो गयी!

एक कविता थी
खो गयी-
जो मिले तो बताना!!

अजीब लगा उसके बिछड़ने का
सोचा न था कोई रिश्ता सा बन गया था उससे

रिश्ता तोड़ना मुश्किल हो रहा है,
जो मिले तो मिलाना
जो दिखे तो बताना!

(सच में एक कविता खो गयी थी| फेसबुक पर ही लिखी  था| रिफ्रेश करने में शायद खो गयी| सेव भी नहीं कर सका था| कुछ याद करके दुबारा लिखा तो "मुलाकातों का सिलसिला" कविता लिख सका!)

मुलाकातों का सिलसिला

ये क्या तरीका है मिलने का?
सलीका ये क्या है मिलने का?

चेहरे पर एक शिकन सी आ जाती है-
पुराने किसी लम्हे को याद करके
चुप हो जाते हो,
अपनी जुबां से फिसलते नादाँ लफ़्ज़ों को
पकड़ लेते हो,
जकड़ लेते हो हौले से

जो पहले मिलते थे
तो यूँ तो न मिलते थे
बेतकल्लुफ तो बातें करते थे हम 
अब जो मुलाक़ात करते हो
तो बहुत तकल्लुफ्शुदा हो गए हो
एक बड़प्पन सा आ गया है तुम्हारी बातों में
जो कमाया होगा तुमने
दुनिया के बाज़ार में-
मैं तो बाज़ार का हिस्सा न था!

वो जो अल्हड़पन था पास तुम्हारे, भूल चुके हो,
ख़ामोशी को अलग एक मतलब दे चुके हो
दुनियादारी की समझ तो होगी तुम्हे, मानता हूँ,
वो जो हमारी छोटी सी दुनिया थी, खो चुके हो

ऐसा करते हैं,
ये जो मुलाकातों का सिलसिला है
खत्म करते हैं

अब,
जब जी चाहे आ जाना मिलने मेरे ख़्वाबों में
मिलेंगे वैसे,जैसे मिलते थे नादाँ बरसातों में....

सौदा

एक सौदा करना है तुझसे,
मेरे ख्वाब!

छीन ले तू मेरी हकीकत
देदे हर रात झूठी सी,
देदे वो लम्हें
जो हर सफह लिखना चाहता हूँ!

ज़िंदगी कोई सौदागर नहीं,
तानाशाह है एक सल्तनत की
तू आजा-
ख्वाब मेरे
पैगंबर बन कर
मुझे रिहा कर दे!

सच्ची ज़िंदगी से बेहतर-
ओ झूठे ख्वाब,
ज़िंदगी पर लिहाफ रहने दे...

ये सौदा पक्का कर!

ग़ज़ल 2

क्या-क्या खोया है, क्या-क्या पाना है
दुनिया के बाज़ार में अंदाज़ा लगाना है

उधार माँग कर मुस्कुराया था कभी 
अब ज़िंदगी भर उधार चुकाना है 

बचपन में एक अल्हड़पन था पास मेरे 
खोयी अमानत से ज़िन्दगी चलाना है 

खुदा-भगवान् कोई भी नहीं, जानता हूँ 
खुद को खोकर फिर किसको पाना है 

क्यूँ इकट्ठा करूँ कागज़-पत्थर तेरे लिए 
जब एक दिन मुझे तुझमे ही समाना है 

ऐ हवा! तू यूँ ख़ामोश ना रहा कर 
तुझे धड़कनों का साथ निभाना है 

मैं हूँ, नहीं हूँ, क्या पता- क्या खबर
झूठी है दुनिया, झूठा सारा ज़माना है

विश्वास

जो मैं ये कह दूँ कि
तुम्हारे ख्वाब सारे झूठे हैं,
तो तुम क्या कहोगे?

जो मैं ये कह दूँ कि
खेल रहा है कोई तुम्हारे विश्वास से,
तो तुम क्या करोगे?

जो मैं ये कह दूँ कि
हर लम्हा एक शैतान बैठा है
तुम्हारे आस पास
जो तुम्हे झूठे दिलासे देता रहता है,
तो क्या कर लोगे तुम?

जो मैं कभी चुनौती दे दूँ
तुम्हारे विश्वास को
तो जवाब क्या होगा तुम्हारा?

बस,
मुझे "झूठा" कह देना,
और वही करना जो तुम्हे करना है|

और क्या कमाता मैं?

कुछ पल साथ बिताये थे,
गपशप करते रातें काटी थी-
जब तुम चाय की चुस्कियाँ लेते थे
रात ढाई बजे

मोटर साइकिल के पीछे बैठ कर
दुनिया की सैर हो जाती थी
जलेबी सी शहर की गलियाँ,
उनसे भी पेचीदा ज़िन्दगी के रस्ते-
सब पर भारी
अपने दो कौड़ी के चुटकुले!

वो जो कभी एग्ज़ाम में फेल हुए,
तुम समझाते थे
साथ में सुट्टा पीते
-वो जो दुनिया को जलाने की ज़िद थी मेरी
सुट्टे की चिंगारी से,
तेरे कहने पर
आज तक दुनिया को छुआ भी नहीं-
उसे उसके ही हाल पर छोड़ दिया

और,
वो एक चेहरे के साथ शाम बिताना
उसके लटों से खेलना
हाथों को मोड़ना
भीड़ में हौले से चुटकी काट कर मुस्कुराना...
और ये सब तुझे बताना

सब कुछ पन्ने दर पन्ने दर्ज करता गया
कुछ ऐसी थी ज़िन्दगी की कमाई
और उस रोज़ तुमने पूछा-
"महीने का कितना कमा लेते हो ?"