आस्था

मैं देखता हूँ
उदासी से घिरे
उस घर को
जिसका सहारा सिर्फ
सुबह-दोपहर-शाम
का भजन है

उस परिवार के मुखिया
को असीम आस्था है
एक आपार शक्ति पर
जो एक दिन सारी
समस्याओं का अंत कर देगा-

वो ख़त्म कर देगा
कर्जदारों का क़र्ज़

देगा मुआवज़ा
कई सालों तक उस बाप के
अपने बच्चों के लिए
आधा पेट सोने का

वो दे देगा माँ को
एक नया गहना
जो वो अपने बेटे के पढ़ाई के कारण
नहीं पहन पाई

वो शायद अचानक से दे देगा
दहेज बेटी के लिए
जो पढ़ी-लिखी तो है
लेकिन इंतज़ार में है
उस असीम शक्ति के कृपा की

वो शायद बना देगा
उस नास्तिक बेटे को आस्तिक
बहुत खुशियाँ देकर
शायद कई हज़ार साल बाद
इस समाज का ढाँचा बदल कर

शायद कई युगों बाद
सिक्कों के वजन के तले
दब कर ख़त्म होती
कई आस्थाओं को फिर से जिंदा करेगा

शायद-शायद-शायद

फिर भी
उनकी सासें टिकी हैं
उस आस्था के ऊपर
जिनके सहारे वो जिंदा हैं

वो जो खूबसूरत है एक फूल की तरह!

वो जो शामिल है मेरे हर पल में 
जिसके साथ रहा हूँ चल मैं 
जिसके कारण ज़िन्दगी हुई रौशन 
एक नूर की तरह 

वो जो खूबसूरत है एक फूल की तरह!


जिसकी मुस्कान हर ग़म भुला दे
जिसका समर्पण प्रेम करा दे 
वो जिसके प्यार के सामने हूँ 
सिर्फ एक धूल की तरह 

वो जो खूबसूरत है एक फूल की तरह!


तुम समझती हो मुझे, तुम अपनाती हो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ- इस हद तक जानती हो मुझे 
मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा हो तुम 
कभी भूल नहीं सकता भूल की तरह

तुम खूबसूरत हो सबसे खूबसूरत फूल की तरह!

समीप आना चाहता हूँ

वो दूर मुझसे जा रही, मैं समीप आना चाहता हूँ

जग विशाल समृद्ध सा है, 
तुम विभा इस जग की 
मैं शुन्य जगत के आकारों में, 
तुच्छ- घिरा हुआ विकारों में 

तुम आकार, मैं निराकार 
बस तुम्हे पाना चाहता हूँ 
मैं समीप आना चाहता हूँ!

मैं नहीं कोई और, तुम्हारी छाया हूँ 
स्वयं कुछ भी नहीं, तुमसे ही बन पाया हूँ 
तुम वर्षा, मैं प्यासा!
बस तुम्हे अपनाना चाहता हूँ
मैं समीप आना चाहता हूँ!

सामिप्य तुम्हारा चाहिए, सानिध्य तुम्हारा चाहिए 
पराया मत समझो, अपनापन तुम्हारा चाहिए, हक तुम्हारा चाहिए!

तुम आत्मा, मैं शरीर!
बस तुम्हारा स्पर्श चाहता हूँ 
एक होना चाहता हूँ 
समीप आना चाहता हूँ!

रात

शहर के तंग गलियारों में
रात के अँधेरे में
फूटपाथ पर-
उम्मीदों को जलते देखा है?
लाशों को चलते देखा है?
देखा है ठंड से सिकुड़ते रूह को?
देखा है लड़ते-झगड़ते जिस्म को?

सुनाई देती है गूँज ख़ामोशी की
मरने की बेबसी चीखती है
चिल्लाती है दिल की धड़कने
सुन्न कर देती है रूह को-
जब भेदती हैं सर्द हवाएँ
माँस के गर्म लोथरों को,
ज़िन्दगी प्यासी ही रह जाती है-
घाव से रिसते मवाद को
किसी की प्यास बुझाते देखा है?

लाशों के अंबार लगे होते हैं-
लाशें पड़ी रहती हैं
मक्खियाँ भिनभिनाती हैं
लाशों के ऊपर
ज़मीन लाल हो जाती है खून से,
और फिर लाशें पीती हैं खून
प्यास बुझाने के लिए

कभी सुना है-
सन्नाटे को काटती
सिसकती
रोती
चीखती
चिल्लाती
बेबस
आसुओं में सनी
जिस्म की पुकार?

तुम्हें सुनाई नहीं देगा
तुम्हें दिखाई नहीं देगा
तुम भी एक लाश हो!

बारिश में एक खुशबू है

बारिश में एक खुशबू है...

सौंधी सी
हलकी सी
जिसमे कोई मिलावट नहीं

वो खुशबू
जो बचपन
में भी सौंधी सी थी,
हलकी सी
बिना किसी मिलावट के

वो खुशबू
मुझे बचपन में लिखी
एक कविता की याद दिलाती है

"छल-छल करता, कल-कल करता
बरस रहा है बूँदा मोटा,
बूँद-बूँद को तरसे जीवन
जीवन का ये पहलू खोटा"

वो खुशबू
मुझे मेरे
बचपन की याद दिलाती है

वो खुशबू
मुझे उस नाव की
याद दिलाती है
जो मैं होमवर्क की कॉपी से
कागज़ फाड़ कर बनाता था-
जिसे मैं मोहल्ले के
छोटी सी नाली में
दौड़ाता था
जिसे दूर जाता देखता था
देर तलक

वो खुशबू
मुझे एहसास दिलाती है
कि मेरी
होमवर्क कॉपी की नाव
अब बड़ी हो गयी है
अब जहाज़ बन गयी है-
अब वो एक समुन्दर में
गोते लगाती है

वो खुशबू
मुझे मेरे घर की याद दिलाती है
वो खुशबू
मुझे मेरे आँगन की याद दिलाती है

देखो ना,
आज कितनी तेज़ बारिश हुई दिल्ली में!

सियासत

जो कुछ
भी था
उसे
सेनापती ने
रख लिया,

सिपाहियों
को तो
मिली
ज़िल्लत की मौत
बस!

ग़ज़ल 6

आज ज़िंदगी बहुत परेशान सी है 
ज़िंदा रहने के खबर से हैरान सी है 

इजाज़त मिली सरकार से जीने की 
ये हुक्म भी मौत के फ़रमान सी है

बढ़ रहा है लिए अंगारे अपने झोले में 
इसकी किस्मत भी हिन्दोस्तान सी है 

डर कहाँ किसी को हैवानियत का 
अब तो डर बस तेरे भगवान की है 

मेरा शहर बहुत साफ़ है आजकल 
पर कुछ लाशों की यहाँ निशान सी है 
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जिसे दुश्मन समझते रहे देर तक 
उसकी शक्ल भी तो इंसान सी है

अलविदा

"कुछ पल पन्नों में बस नहीं सकते,
दिल में बसा के रखना होता है उन्हें"

यूँ तो सफर लम्बा सा था
एक सफह पलट कर देखता हूँ अब
तो कुछ पत्ते नज़र आते हैं-
मुड़े से, ज़मीन पर गिरे से,
साथ ही हमने रौंदा था उन्हें
चले थे कारवाँ लेकर जब

चुन लो वो पत्ते
हमारी यादों के गवाह हैं वो

हो सके तो
रख लेना अपने पास
हर वो लम्हा
जो साथ बिताया था हमने
हर पल में कुछ
ओस की बूँदें शामिल कर दी हैं मैने-
कुछ मिलावट आँसुओं की भी होगी शायद

देख लेना एक बार
अपनी उँगलियों से सहला कर!

वक्त गुज़रेगा
(गुज़रता ही है)
फिर से कहानी कोई नयी आएगी
मंच सजेगा
तुम होगे वहाँ फिर से
मेरी कमी को महसूस करना
हो सके तो...

तब बुदबुदा देना
हवा के कानों में मेरा नाम-
जब गुजरेंगे मेरे पास से
तो सुन लूँगा मैं

कुछ सामान यूँ छोड़े जाता हूँ
तुम्हारे पास

रिश्ते बुनते तो नहीं हम,
बेबाक से रिश्ते
बन जाते हैं खुद-ब्-खुद

कैसे कह दूँ
कोई रिश्ता नहीं तुमसे?
खुद से पूछ लो-

कुछ तो है
हमारे दर्मयाँ शायद
कुछ तो बन गया था
हमारे दर्मयाँ शायद...

ज़हरीले चुटकुले

वो जो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

जब शहर नाख़ून सा होता है
वो जो सपने देखता है,ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

उधार की ज़िंदगी में, माँस के लोथरे में
जब हड्डियाँ टकराती हैं, जब तूफ़ान बदन में उठता है
जब प्यास गला सुखाती है, जब अपना खून पीना पड़ता है 

तब जब वो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

कुकुरमुत्तों के झुण्ड में, इंसान का बच्चा पलता है
खूँखार हँसी वो हँसता है
जब बदन बेशरम हो जाता है
सन्नाटे में अधनंगे जिस्म की हेराफेरी होती है
गाली जब नाम बन जाते हैं
जब पैदा होना एक पाप बन जाता है 

तब जब वो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है

जब साँस कभी वो लेता है, जब पैदल दो कदम भी चलता है
शहर आवारा सा
शहर सुनामी सा
शहर बदतमीज़ सा
जब उसे घसीटता है
ज़मीन पर लेटा कर जब उसे कुचलता है

तब जब वो सपने देखता है, ज़हरीले चुटकुले सुनाता है!