ग़ज़ल

ये कौन लोग हैं जो मुझे जानते हैं
मैं 'मैं' नहीं हूँ, ये क्यों नहीं मानते हैं

शहर की वीरानियों में चलना ठीक है
एक आप हैं जो भीड़ को ही छानते हैं

ख्वाब सारे खो गए, देखो कब के
अब हम रात को बस रात मानते हैं

बारिश होती है तो कुछ याद तो आता है
चलो छोड़ो, अब तुम्हें हम नहीं जानते हैं

ग़ज़ल

हैं कहानियाँ बहुत हमारे पास, ये तेरा मेरा अफसाना है
हमें छोड़ दो इन गलियों में, के तुम्हें घर भी जाना है

मैं मुझसा नहीं कोई और हूँ, लोग पागल भी कहते हैं
सब कुछ गवां के जो खोजूँ जाने वो कौन सा खजाना है

ख्वाब यूँ के सब खो गए, सपने सारे कब के सो गए
तुम आ जाओ बस- एक नींद बची है, साथ सो जाना है

मैं वहाँ पहुँच भी चुका जिस सफ़र पे साथ निकले थे
अरे, तुम ही खो गए, बस उम्र भर खुद को समझाना है

6.6.17