ग़ज़ल

ये कौन लोग हैं जो मुझे जानते हैं
मैं 'मैं' नहीं हूँ, ये क्यों नहीं मानते हैं

शहर की वीरानियों में चलना ठीक है
एक आप हैं जो भीड़ को ही छानते हैं

ख्वाब सारे खो गए, देखो कब के
अब हम रात को बस रात मानते हैं

बारिश होती है तो कुछ याद तो आता है
चलो छोड़ो, अब तुम्हें हम नहीं जानते हैं

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